tag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1113288355753623172007-01-31T02:24:00.000+05:302007-01-31T02:24:36.896+05:30मांडूहर ओर टूटी इमारतें, खिरती दीवारें और दरकते मचान,<br />फिर भी मेरा यह शहर अपनी बुलंदियों पर इतराता फिर रहा है ।<br /><br />महलों को छोड़ बेगमें सड़क पर आ गई हैं,<br />हरम अब बांदियों और लौंडियों के सहारे ज़िंदा हैं ।<br /><br />रूपमती के झरोखे से अब नर्मदा नजर नहीं आती,<br />हरेक की नजर में कुहासा छा गया है ।<br /><br />मिट गये हैं जामा मस्ज़िद से अजान देने वाले,<br />अशर्फी महल की आयतें अब दुर्गति पढ़ रही हैं ।<br /><br />सब कुछ इतिहास, अब वर्तमान खत्म हो चला है,<br />मेरा ये शहर अब मांडू हो चला है ।कृतिकारnoreply@blogger.com