tag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1095417576907638492004-09-17T16:06:00.000+05:302004-09-17T16:13:44.053+05:30रिश्तेरिश्ते, <br />जो तैयार होते हैं, <br />संबोधन की नींव से, <br />सामीप्य की दीवारों से । <br /> <br />हर साथ बिताया पल, <br />एक उस ईंट की तरह, <br />जो इमारत की बुनियाद बनती है । <br /> <br />फिर साथ रहते हुए, <br />हम इन्हें संभालने की कोशिश करते हैं । <br />ये बंट जाते हैं छोटे छोटे बक्सों में, <br />हरेक अपने प्रकोष्ठ में बंद । <br /> <br />प्रकोष्ठ, <br />जिसका एक ही दरवाजा होता है, <br />भीतर बाहर जाने के लिए । <br /> <br />रिश्ते जो भवन नजर आते हैं बाहर से, <br />किंतु भीतर से होते हैं रीते बक्से । <br />आओ हम तुम कोशिश करें, <br />इन बक्सों से बाहर रहने की । <br /> <br />वह मंजिल तैयार करें, <br />जहां कोई दीवार न हो. <br />न प्रकोष्ठ, न दरवाजा, <br />ताकि किसी रिश्ते के लिए <br />फिर सांकल न बजानी पड़े ।। <br /> <br />कृतिकारnoreply@blogger.com